शीतला माता के भजन | बसोड़ा भजन और आरती
शीतला माता के भजन उत्तर भारत के पुराने लोकगीत हैं। बसोड़ा के दिन औरतें माता की पूजा करते हुए ये भजन गाती हैं। ये गीत माता शीतला की महिम...
पढ़ें →धरती माता की कथा हमें जीवन में धैर्य, परोपकार और सहनशीलता का महत्व सिखाती है। इस कथा का श्रवण विशेष रूप से व्रत और पूजन के दौरान किया जाता है। माना जाता है कि जो भक्त धरती माता की सच्ची मन से पूजा और कथा करते हैं, उन्हें जीवन में स्थिरता और सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। यह कथा हमें प्रकृति और अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान सिखाती है।
धरती माता की कथा - सतीत्व रक्षा की गाथा
बहुत समय पहले की बात है। किसी गांव में एक औरत रहती थी। उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी। उस औरत का एक बेटा और एक बेटी थी। वे लोग बहुत गरीब थे। वह औरत मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट भरती थी।
धीरे-धीरे समय बीतने लगा और बच्चे बड़े होने लगे। बेटी विवाह के योग्य हो गई। औरत बूढ़ी हो चुकी थी। तब उस औरत ने अपने बेटे से कहा - "बेटा, तेरी बहन के योग हो गए हैं, इसलिए अब उसकी शादी करनी चाहिए। तुम्हारे जैसा घर और वर देखकर उसका विवाह करना।"
कुछ दिनों बाद वह औरत मर गई। अब बेटा-बेटी अकेले रह गए। बेटा अपनी बहन के लिए लड़का ढूंढने गांव-गांव में गया, लेकिन बहन के लिए उचित वर नहीं मिला। वह घूम-घूमकर थक गया।
एक दिन वह सोचने लगा - "मेरे जैसा तो इस दुनिया में कोई नहीं है, इसलिए मैं ही इससे शादी कर लेता हूं।" ऐसा सोचकर वह चुनरी और शादी के लिए सब सामान लेकर आया।
उसकी बहन ने देखकर पूछा - "तुम यह सब सामान क्यों लाए हो?"
तब भाई ने कहा - "यह सब तुम्हारी शादी के लिए लाया हूं।"
गांव वालों ने बहन को बताया - "तुम्हारा भाई तुमसे ही शादी करने वाला है।"
बहन ने अपने भाई से पूछा - "मेरी शादी किससे कर रहे हो?" इस पर भाई ने कोई जवाब नहीं दिया। तब बहन समझ गई कि गांव वाले सही कह रहे हैं।
उसने एक लोटे में जल लिया, चुनरी ली और चप्पल पहनकर जंगल की तरफ चली गई। जंगल में गाय चराने वाले ग्वालों ने उससे पूछा - "कहां जा रही हो?"
तो वह कुछ नहीं बोली और चुपचाप जंगल की ओर चली गई। वह धरती माता को पुकारने लगी और बोली - "हे धरती मां! अब तुम्हें ही मेरी लाज रखनी होगी, वरना अनर्थ हो जाएगा। मैं क्या करूं? मां, मुझे अपनी गोद में ले लो, नहीं तो अन्याय हो जाएगा।"
तब धरती फटी और बहन उसमें समाने लगी। बहन ने एक तरफ लोटा, चुनरी और चप्पल रख दिए और वह धरती में जाने लगी।
इतने में दौड़ता हुआ उसका भाई जंगल में आया। उसने ग्वालों से पूछा - "मेरी बहन किधर गई है?"
ग्वालों ने कहा - "तेरी बहन उस तरफ गई है।"
भाई वहां पहुंचा तो देखा कि बहन धरती में समा रही है। उसके केवल कुछ बाल बाहर दिख रहे थे। भाई ने रोते हुए बहन के बाल मुट्ठी में पकड़ लिए।
"बहन! तू सत्य के लिए धरती माँ की गोद में समा गई। मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी। माँ का वचन निभाने के लिए मेरे जैसा कोई वर नहीं मिला, इसलिए ऐसा पाप विचार आया। पर धरती माँ ने सत्य के लिए बेटी को अपने में समा लिया। हाय! मैं कितना बड़ा पापी हूं।"
भाई जोर-जोर से रोने लगा लेकिन बहन पूरी तरह धरती के अंदर समा गई। जो बाल बाहर थे, वो दूब घास बन गए।
धरती माता ने अपनी सच्ची बेटी की लाज रख ली और उसे अपनी गोद में स्थान दिया।
उद्यापन विधि: इसलिए औरतें इस कहानी को सुनती हैं और धरती माता को प्रसन्न करने के लिए उद्यापन करती हैं। उद्यापन में एक लोटा, चप्पल, चुनरी, एक बर्तन में हरे मूंग और एक लड्डू किसी कुंवारी कन्या को या ब्राह्मण को दान करना चाहिए।
जो भी औरत श्रद्धा से यह कहानी सुनती है और उद्यापन करती है, धरती माता उसे सुखी रखती हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।
जय धरती माता की! जय हो धरती माता की!
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