शीतला माता के भजन | बसोड़ा भजन और आरती
शीतला माता के भजन उत्तर भारत के पुराने लोकगीत हैं। बसोड़ा के दिन औरतें माता की पूजा करते हुए ये भजन गाती हैं। ये गीत माता शीतला की महिम...
पढ़ें →राई दामोदर की यह दिव्य कथा कार्तिक मास में विशेष रूप से सुनाई जाती है। इस कथा में दर्शाया गया है कि किस प्रकार एक बूढ़े निःसंतान ब्राह्मण दंपति को भगवान कार्तिक और राई दामोदर की दिव्य कृपा से बहू और पुत्र की प्राप्ति हुई। यह कथा हमें धर्म, सत्य और भक्ति का महत्व समझाती है। जो भक्त श्रद्धा और भक्ति भाव से इस कथा को सुनते हैं, उनके घर में सुख-शांति, संतान सुख और समृद्धि का वास होता है।
🌸कार्तिक मास की पंचमी तिथि की पावन कथा🌸
कार्तिक के पावन महीने में अनेक धार्मिक कथाएं कही-सुनी जाती हैं, किन्तु यह कथा अत्यंत विशिष्ट और चमत्कारिक है।
प्राचीन काल में किसी नगर में एक वृद्ध ब्राह्मण और उनकी पत्नी निवास करते थे। वे दोनों प्रत्येक दिन सात कोस की कठिन यात्रा कर गंगा-यमुना के पावन जल में स्नान करने जाते थे। इतनी लम्बी और थकाऊ यात्रा से ब्राह्मणी अत्यधिक थक जाती थीं। एक दिन उन्होंने अपने पति से कहा - "यदि हमारा कोई पुत्र होता तो घर में बहू आ जाती। हम जब यात्रा से वापस लौटते तो घर में पका हुआ भोजन तैयार मिलता और धुले हुए वस्त्र भी मिलते।"
यह सुनकर ब्राह्मण बोले - "तुमने बहुत उत्तम बात कही है! मैं अभी जाकर तुम्हारे लिए एक बहू ले आता हूँ।" यह कहकर उन्होंने कहा - "एक पोटली बनाओ और उसमें थोड़ा आटा रखो, साथ ही कुछ स्वर्ण मुद्राएं भी डाल दो।" पत्नी ने वैसा ही किया और ब्राह्मण पोटली लेकर निकल गए।
कुछ दूरी पर एक गांव में पहुंचकर उन्होंने यमुना तट पर अनेक सुंदर बालिकाओं को मिट्टी के घरौंदे बनाकर खेलते देखा। उन बालिकाओं में से एक कन्या ने कहा - "मैं अपने बनाए घर को नहीं तोड़ूंगी, यह घर मुझे संभालकर रखना है।" यह वचन सुनकर ब्राह्मण के हृदय में विचार आया कि बहू के लिए यह कन्या सर्वोत्तम रहेगी। जब वह बालिका अपने घर जाने लगी तो ब्राह्मण भी उसके पीछे चल दिए।
जब कन्या अपने आवास पर पहुंची तो वृद्ध ब्राह्मण ने उससे कहा - "पुत्री! कार्तिक का पवित्र महीना चल रहा है, इसलिए मैं किसी भी घर में भोजन ग्रहण नहीं करता। तुम अपनी माता से कहो कि यदि वे मेरा लाया हुआ आटा छानकर कुछ रोटियां बना दें, तो मैं वह भोजन कर सकता हूँ।"
बालिका ने जाकर अपनी माता को सारी बात बताई। माता ने कहा - "बेटी, बाबा जी से कह दो कि वे हमारी बनाई रोटियां खा लें।" लेकिन कन्या ने कहा - "नहीं माँ! उन्होंने साफ कहा है कि केवल अपने आटे से बनी रोटी ही खाएंगे।" तब माता बोली - "ठीक है, उनका आटा ले आओ।"
जब माता ने आटा छाना तो उसमें से सोने की मोहरें और अशर्फियां निकलीं। यह देखकर वह सोचने लगी - जिसके आटे में इतना सोना हो, उसके घर में कितना धन होगा!
जब ब्राह्मण भोजन के लिए बैठे तो कन्या की माता ने पूछा - "बाबा जी! क्या आप अपने पुत्र के लिए वधू की खोज में निकले हैं?" ब्राह्मण ने उत्तर दिया - "मेरा पुत्र तो काशी नगरी में शिक्षा ग्रहण कर रहा है। यदि आप चाहें तो मैं सरल विधि से आपकी कन्या का विवाह करके साथ ले जा सकता हूँ।"
माता ने सहमति दे दी और ब्राह्मण कन्या का विवाह कर उसे अपने घर ले आए। घर पहुंचकर उन्होंने पुकारा - "द्वार खोलो! मैं तुम्हारे लिए बहू लेकर आया हूँ।"
ब्राह्मणी ने कहा - "संसार पहले से ही हमें ताने मारता है, अब तुम भी हंसी-मजाक कर रहे हो। हमारे तो अनेक जन्मों में कोई संतान नहीं है, फिर बहू कहां से आएगी?"
ब्राह्मण बोले - "पहले द्वार तो खोलो!" जब ब्राह्मणी ने द्वार खोला तो सचमुच एक सुंदर बहू को खड़ा पाया। उसने प्रेम और आदर से बहू का स्वागत किया।
अब जब सास-ससुर स्नान के लिए प्रस्थान करते, बहू घर के सभी कार्य पूर्ण कर देती। भोजन पकाना, वस्त्र धोना और रात में उनके चरण दबाना - सब कुछ बहू करती थी। इस तरह कुछ समय व्यतीत हो गया।
एक दिन सास ने बहू को सीख देते हुए कहा - "पुत्री, ध्यान रखना कि चूल्हे की अग्नि कभी बुझने न पाए और घड़े में जल सदैव भरा रहे।"
एक दिन ऐसा हुआ कि चूल्हे की आग बुझ गई। बहू तुरंत पड़ोसन के घर दौड़ी और बोली - "मुझे कुछ आग दे दीजिए, मेरा चूल्हा बुझ गया है। सास-ससुर सुबह से बाहर गए हुए हैं, थके-मांदे लौटेंगे तो उनके लिए खाना तैयार करना है।"
पड़ोसन ने कहा - "अरी भोली बालिके! तुझे तो ये दोनों बुजुर्ग बेवकूफ बना रहे हैं। इनके न कोई पुत्र है, न पुत्री।"
बहू ने विरोध किया - "नहीं, आप ऐसा न कहें। उनका पुत्र काशी में विद्या पढ़ रहा है।"
पड़ोसन फिर बोली - "अरे, उन्होंने तुझे झूठ कहकर यहाँ लाया है। उनकी कोई संतान नहीं है।"
अब बहू पड़ोसन की बातों में आकर पूछने लगी - "तो अब मुझे क्या करना चाहिए?" पड़ोसन ने गलत परामर्श दिया - "जब वे आएं तो जली हुई रोटियां परोसना, नमक रहित दाल बनाना। खीर और दाल की कलछी अदल-बदल कर देना।"
बहू ने वैसा ही किया। जब सास-ससुर आए तो न उनका स्वागत किया, न वस्त्र धोए।
भोजन परोसते समय सास ने पूछा - "बहू, ये रोटियां जली क्यों हैं? दाल में नमक भी नहीं है?"
बहू ने कठोर शब्दों में कहा - "आज यही खा लीजिए। एक दिन ऐसा भोजन करने से आपका क्या बिगड़ जाएगा। मुझे तो जीवन भर अनाथ ही रहना है।"
सास समझ गई कि किसी ने बहू को गलत मार्ग दिखाया है।
बहू पुनः पड़ोसन के पास गई। पड़ोसन ने कहा - "अब तुम सातों कोठों की कुंजी मांग लो।"
अगले दिन जब सास निकलने लगी तो बहू ने हठ किया - "मुझे सातों कोठों की कुंजी चाहिए।"
ससुर ने कहा - "दे दो इसे कुंजी। आज या कल तो देनी ही है। हम भी सदा के लिए तो नहीं रहेंगे।"
सास-ससुर के जाने के पश्चात बहू ने कोठे खोलने शुरू किए। किसी में अन्न का भंडार था, किसी में धन-संपत्ति थी, किसी में बर्तन रखे थे - सभी कोठों में अपार संपदा थी।
जब उसने सातवां कोठा खोला तो वहां अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। उस कोठे में भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश, माता लक्ष्मी, पीपल माता, कार्तिक भगवान, राई दामोदर, तुलसी का पवित्र पौधा, गंगा-यमुना की धाराएं - सब कुछ था। छत्तीस करोड़ देवी-देवता विराजमान थे। और वहीं एक तेजस्वी युवक चंदन की चौकी पर बैठकर माला जप कर रहा था।
बहू ने आश्चर्य से पूछा - "आप कौन हैं?"
युवक ने शांत स्वर में उत्तर दिया - "मैं तुम्हारा पति हूँ। द्वार बंद कर दो, माता-पिता के आगमन पर खोलना।"
यह सब देखकर बहू अत्यंत आनंदित हुई। उसने पूरा सोलह श्रृंगार किया, सुंदर वस्त्र धारण किए और सास-ससुर की प्रतीक्षा करने लगी। उसने छत्तीस प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए।
जब सास-ससुर वापस आए तो बहू ने उनका हार्दिक स्वागत-सत्कार किया। उनके वस्त्र धोए, पैर दबाए।
बहू ने सास से कहा - "माता जी, आप इतनी लंबी यात्रा करके गंगा-यमुना में स्नान करने जाती हैं और थक जाती हैं। आप घर में ही स्नान क्यों नहीं कर लेतीं?"
सास ने आश्चर्य से पूछा - "भला गंगा-यमुना भी घर में बहती हैं क्या?"
बहू मुस्कुराकर बोली - "हां माता जी, बहती हैं। आइए, मैं आपको दिखाती हूँ।"
उसने सातवां कोठा खोलकर दिखाया। उसमें श्री गणेश, माता लक्ष्मी, भगवान महादेव, माता पार्वती, पीपल माता, तुलसी जी, कार्तिक भगवान, राई दामोदर, गंगा-यमुना की पवित्र धाराएं - सब प्रवाहमान थीं। छत्तीस करोड़ देवी-देवता वहां विराजमान थे। और वहीं माथे पर तिलक लगाए एक दिव्य युवक माला जप रहा था।
माता ने पूछा - "तुम कौन हो, वत्स?"
युवक ने प्रेम से उत्तर दिया - "माँ, मैं आपका पुत्र हूँ।"
माता ने पूछा - "तुम कहाँ से आए हो?"
युवक ने कहा - "मुझे भगवान कार्तिक और राई दामोदर ने आपके पास भेजा है।"
माता चिंतित होकर बोली - "पुत्र, यह संसार कैसे विश्वास करेगा? मेरे परिवार के लोग, रिश्तेदार, पड़ोसी - कैसे मानेंगे कि तुम सचमुच मेरे पुत्र हो?"
माता ने विद्वान ब्राह्मणों से परामर्श लिया। उन्होंने कहा - "एक ओर बहू और पुत्र खड़े हों तथा दूसरी ओर माता खड़ी हो। यदि माता के चमड़े के वस्त्र से दूध की धारा बहे, पुत्र की दाढ़ी-मूंछ भीग जाए और पवन तथा जल की साक्षी में बहू-पुत्र का गठबंधन बंध जाए, तो यह सिद्ध हो जाएगा कि यह माता का ही पुत्र है।"
वैसा ही हुआ। चमड़े का वस्त्र फट गया, माता की छाती से दूध की धारा प्रवाहित हुई, पुत्र की दाढ़ी-मूंछ भीग गई और पवन-जल की दिव्य साक्षी में बहू-पुत्र का गठबंधन बंध गया।
ब्राह्मण दंपत्ति का आनंद असीम हो गया। वे अत्यंत प्रसन्न और कृतज्ञ हुए।
हे कार्तिक भगवान! हे राई दामोदर! जिस प्रकार आपने इस दंपत्ति को बहू और पुत्र का सुख प्रदान किया, वैसे ही समस्त भक्तों को प्रदान करें।
जय श्री राधे कृष्ण 🙏🏻
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